सच्चे मित्र की परिभाषा मित्रता दिवस
मित्र भगवान का जीता जागता चित्र !
******************************
चूकी ईश्वर हर समय हर के साथ नही हो सकता, तो वो अपने आपको मित्र के रूप में परिवर्तित कर लेते हैं। ताकि वो हमेशा हमारे साथ रहें जीवन के विभिन्न आयामों में। कोई यह कोरी कपोल कल्पना नहीं है। उसका दृष्टांत हमे महाभारत में मिलता है की कैसे भगवान श्री कृष्ण अपने मित्र अर्जुन का साथ उस भीषण युद्ध में भी नही छोड़ते हैं। मित्र के परीक्षा के घड़ी में जो उसका साथ छोड़ देता है वो नराधम है। और अंत में हजारों वर्षों तक नरक भोगता है।
अतः मित्र भगवान स्वरूप हैं। उनके साथ सदैव उसी भाव से व्यवहार करें। रामचरित मानस की निम्नलिखित चौपाइयां स्वतः प्रमाण हैं:
जे न मित्र दु:ख होहिं दुखारी। तिन्हहि बिलोकत पातक भारी॥
निज दु:ख गिरि सम रज करि जाना। मित्रक दु:ख रज मेरु समाना॥1॥
भावार्थ
जो लोग मित्र के दुःख से दुःखी नहीं होते, उन्हें देखने से ही बड़ा पाप लगता है। अपने पर्वत के समान दुःख को धूल के समान और मित्र के धूल के समान दुःख को सुमेरु (बड़े भारी पर्वत) के समान जाने॥1॥
हमारे लिए हमारा हर मित्र भगवान श्री कृष्ण का स्वरूप है। इस मित्रता दिवस पर मैं अपने सभी मित्रो के प्रति कृतज्ञता ज्ञापित करता हूं। उनके सहयोग और उपकार को मैं जीवन भर किसी बहुमूल्य धरोहर की भांति अपने हृदय की अतल गहराइयों में समाहित रखूंगा। उनका सदैव ऋणी हूं। आज जो कुछ भी हूं उनमें उनका अविस्मरणीय योगदान हैं।
मै अपने सभी मित्रों को इस अवसर पर याद करता हूं और आदर सहित नमस्कार करता हूं।
आप सभी महानुभावों को मित्रता दिवस की ढेरों शुभकामनाएं ।
आदर और प्रेम सहित !
आपका सदैव अनुरागी,
आपका अकिंचन मित्र
प्रवीण सिंह
दिल्ली, भारत।
Comments
Post a Comment